राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) के लागू होने के साथ , शिक्षा के उद्देश्य केवल रटने तक ही सीमित न रहकर , छात्रों के समग्र विकास , आलोचनात्मक सोच और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव की और स्थानांतरित हो गए है | इसी क्रम में सीबीएसई द्वारा 2026 तक पूर्ण रूप से लागू होने वाली नई भाषा नीति को एक बड़ा क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है इस नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू कक्षा 6 से तीसरी भाषा के अध्ययन को अनिवार्य बनाना है
एक रिपोर्ट के अनुसार इस नियम के तहत कक्षा 6 में प्रवेश के समय दो भारतीय भाषाओ के अतिरिक्त एक तीसरी भाषा भी छात्र को पढ़नी होगी , NCFSE की सिफारिशों के अनुसार ये तीनो भाषाएँ जो छात्र ने कक्षा 6 में प्रवेश के समय चयनित की है ये सभी भाषाएँ उसके पाठ्यक्रम में कक्षा 9 और कक्षा 10 तक जारी रहेंगी यानि उस छात्र को 2031 की सीबीएसई बोर्ड परीक्षा में उस चयनित तीसरी भाषा की भी परीक्षा बोर्ड परीक्षार्थी के रूप में देनी होगी और केवल परीक्षा ही नहीं देनी होगी बल्कि उसमे ज्ञान और कौशल भी प्राप्त करना होगा |
नई नीति की पृष्ठभूमि और त्रि-भाषा सूत्र
CBSE की यह पहल मूल रूप से राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में उल्लिखित 'त्रि-भाषा सूत्र' (Three-Language Formula) के क्रियान्वयन का ही एक सुदृढ़ रूप है। यद्यपि त्रि-भाषा सूत्र भारत में दशकों से चर्चा में रहा है, लेकिन NEP 2020 और उसके बाद CBSE के दिशा-निर्देशों ने इसे एक नई ऊर्जा और स्पष्टता प्रदान की है। 2026 के शैक्षणिक सत्र से, यह अपेक्षा की जाती है कि यह नीति देश भर के सभी CBSE संबद्ध स्कूलों में पूरी तरह से प्रभावी हो जाएगी।
इस नीति का मूल ढांचा इस प्रकार है:
पहली भाषा (L1): आमतौर पर यह मातृभाषा या स्थानीय/क्षेत्रीय भाषा होगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चे की प्रारंभिक शिक्षा उस भाषा में हो जिसमें वह सबसे सहज है।
दूसरी भाषा (L2): हिंदी भाषी राज्यों में यह अंग्रेजी या कोई अन्य आधुनिक भारतीय भाषा हो सकती है। गैर-हिंदी भाषी राज्यों में, यह हिंदी या अंग्रेजी हो सकती है।
तीसरी भाषा (L3): यहीं पर कक्षा 6 से अनिवार्य बदलाव आता है। यह भाषा पहली दो भाषाओं से अलग होनी चाहिए। ये भाषा अंग्रेजी भी हो सकती है क्योंकि अंग्रेजी को विदेशी भाषा माना जायेगा |
2026 की नीति के अनुसार, जब कोई छात्र कक्षा 6 में प्रवेश करेगा, तो उसे औपचारिक रूप से एक तीसरी भाषा चुननी होगी और उसका अध्ययन करना होगा। यह अध्ययन केवल परिचयात्मक नहीं होगा, बल्कि इसमें एक निश्चित स्तर की दक्षता हासिल करने का लक्ष्य होगा।
सीबीएसई इस सबके लिए जल्दी ही एक सर्कुलर जारी कर सकता है , सत्र 2026-27 के लिए सीबीएसई कक्षा 6 हेतु तीसरी भाषा के लिए 9 भाषाओँ में अध्धयन सामग्री तैयार कर रहा है इन भाषाओँ में तमिल , गुजराती ,मलयालम , कन्नड़ तेलगु और बंगाली भाषाओँ को शामिल किया जा रहा है
कक्षा 6 से तीसरी भाषा की अनिवार्यता के उद्देश्य और लाभ
कक्षा 6 को इस शुरुआत के लिए एक आदर्श बिंदु माना गया है क्योंकि इस उम्र (लगभग 11-12 वर्ष) में बच्चों का मस्तिष्क नई भाषाओं को सीखने के लिए अत्यधिक ग्रहणशील होता है। इस नीति के बहुआयामी लाभ हैं:
संज्ञानात्मक विकास (Cognitive Development): वैज्ञानिक शोधों से यह प्रमाणित है कि बहुभाषिकता मस्तिष्क के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एक नई भाषा सीखने से समस्या-समाधान कौशल, बेहतर याददाश्त, मल्टीटास्किंग क्षमता और रचनात्मकता में वृद्धि होती है। यह मस्तिष्क के लिए एक उत्कृष्ट व्यायाम है।
सांस्कृतिक एकीकरण और राष्ट्रीय एकता: भारत एक विविधताओं वाला देश है। अक्सर, भाषा एक बाधा बन जाती है जो विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को एक-दूसरे की संस्कृति को समझने से रोकती है। जब उत्तर भारत का एक छात्र तमिल या कन्नड़ सीखता है, या दक्षिण भारत का छात्र मराठी या बंगाली सीखता है, तो वे केवल शब्द नहीं सीखते, बल्कि वे उस संस्कृति, साहित्य और समाज के लोकाचार से भी जुड़ते हैं। यह नीति भाषाई आधार पर बंटे समाज में एक सेतु का काम करेगी, जिससे राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी।
भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देना: वैश्वीकरण के दौर में, अंग्रेजी के प्रभुत्व के कारण कई समृद्ध भारतीय भाषाएं उपेक्षित महसूस कर रही थीं। CBSE की यह नीति भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं (जैसे संस्कृत, तमिल, तेलुगु, मलयालम, उड़िया, असमिया, आदि) के अध्ययन को प्रोत्साहित करती है। यह भारत की भाषाई विरासत को संरक्षित करने और उसे अगली पीढ़ी तक पहुँचाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
2026 तक पूर्ण कार्यान्वयन के लिए CBSE अभी से तैयारी कर रहा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि तीसरी भाषा का यह अध्ययन छात्रों पर बोझ नहीं बनना चाहिए। NEP 2020 'योग्यता-आधारित शिक्षा' (Competency-Based Education) पर जोर देती है।
इसका अर्थ है कि तीसरी भाषा का पाठ्यक्रम भारी-भरकम व्याकरण की किताबों को रटने पर केंद्रित नहीं होगा। इसके बजाय, जोर संवाद कौशल, भाषा की बुनियादी समझ और कार्यात्मक उपयोग पर होगा। कक्षा 6, 7 और 8 (मिडिल स्टेज) में छात्र इस भाषा के मूलभूत सिद्धांतों को सीखेंगे। इसका मूल्यांकन भी तनावमुक्त और सतत तरीके से किया जाएगा, ताकि छात्र भाषा सीखने की प्रक्रिया का आनंद ले सकें।
हालांकि यह नीति सिद्धांत रूप में उत्कृष्ट है, लेकिन 2026 तक इसके सफल कार्यान्वयन में कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं, जिन पर ध्यान देना आवश्यक है:
योग्य शिक्षकों की कमी: यह सबसे बड़ी बाधा है। देश भर में विभिन्न भारतीय भाषाओं (विशेषकर दक्षिण भारतीय भाषाओं को उत्तर भारत में और इसके विपरीत) को पढ़ाने के लिए प्रशिक्षित और योग्य शिक्षकों की भारी कमी है। स्कूलों को इन शिक्षकों की नियुक्ति या मौजूदा शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए बड़े पैमाने पर निवेश करना होगा।
संसाधनों की उपलब्धता: गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकें, डिजिटल सामग्री और भाषा प्रयोगशालाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना, विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के स्कूलों में, एक चुनौती होगी।
पाठ्यक्रम का संतुलन: छात्रों पर पहले से ही गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे मुख्य विषयों का दबाव है। यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण होगा कि तीसरी भाषा का अतिरिक्त भार उनके समग्र शैक्षणिक प्रदर्शन या मानसिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित न करे।
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